राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद Class 9 NCERT Solutions | Hindi Ganga Chapter 9 में गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित राम, लक्ष्मण और परशुराम के बीच हुए संवाद को सरल भाषा में समझाया गया है। इस पाठ में शिवधनुष टूटने के बाद परशुराम के क्रोध, लक्ष्मण के तीखे उत्तर और श्रीराम की विनम्रता का प्रभावशाली चित्रण मिलता है। यह अध्याय विद्यार्थियों को विनम्रता, धैर्य, साहस और उचित व्यवहार का महत्व समझाता है।

राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद Class 9 NCERT Solutions | Hindi Ganga Chapter 9
मेरे उत्तर, मेरी समझ
निम्नलिखित प्रश्नों के सटीक उत्तर चुनिए और यह भी बताइए कि आपको ये उत्तर उपयुक्त क्यों लगते हैं?
Q1. “सपुत समेत कहि कहि निज नावा। लगे करन सब दंड प्रणावा॥” यह पंक्ति सभा में उपस्थित लोगों की किस मनःस्थिति को दर्शाती है?
(क) आदर और सम्मान
(ख) भक्ति और श्रद्धा
(ग) भय और शिष्टाचार
(घ) प्रेम और सहिष्णुता
उत्तर: (ग) भय और शिष्टाचार
कारण: सभा में उपस्थित लोग परशुराम के तेज और क्रोध को देखकर डर गए। डर के कारण और परंपरा के अनुसार उन्होंने तुरंत प्रणाम किया।
Q2. “जनक बहोरि आइ सिरु नावा। सीय बोलाइ प्रनामु करावा॥” पंक्ति से राजा जनक के व्यवहार की कौन-सी विशेषता उद्घाटित होती है?
(क) संवेदनशीलता
(ख) शिष्टता
(ग) सहनशीलता
(घ) उदासीनता
उत्तर: (ख) शिष्टता
कारण: राजा जनक ने सीता को बुलाकर राम से प्रणाम करवाया। यह उनके आदरपूर्ण और मर्यादित व्यवहार को दिखाता है।
Q3. “अति रिस बोले बचन कठोरा।” जनक के प्रति परशुराम के कठोर वचन बोलने का मूल कारण था—
(क) उचित आदर-सत्कार न मिलना
(ख) जनक द्वारा समाचार छिपाना
(ग) शिव-धनुष का खंडित होना
(घ) अन्य राजाओं की सभा में उपस्थिति
उत्तर: (ग) शिव-धनुष का खंडित होना
कारण: परशुराम शिव-धनुष को भगवान शिव का प्रतीक मानते थे। उसका टूटना उन्हें अपमान जैसा लगा, इसलिए वे जनक पर कठोर वचन बोले।
Q4. राम का कथन “होइहि केउ एक दास तुम्हारा” उनके व्यक्तित्व की किस विशेषता को दर्शाता है?
(क) कूटनीति और चतुराई
(ख) विनम्रता और मर्यादा
(ग) त्याग और समर्पण
(घ) दृढ़ता और आत्मविश्वास
उत्तर: (ख) विनम्रता और मर्यादा
कारण: राम ने परशुराम को शांत करने के लिए विनम्रता से कहा कि कोई न कोई आपका सेवक अवश्य होगा। इससे उनकी नम्रता और मर्यादा स्पष्ट होती है।
Q5. “सुनि मुनि बचन लखन मुसुकाने। बोले परसु धरहिं अपमाने॥” लक्ष्मण के मुसकराने और उपहास भरे वचनों का क्या कारण था?
(क) वे सभा में अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करना चाहते थे।
(ख) उन्हें राम के प्रति अपना प्रेम प्रदर्शित करना था।
(ग) वे परशुराम की शक्ति से अनभिज्ञ थे।
(घ) वे परशुराम को चुनौती देना चाहते थे।
उत्तर: (घ) वे परशुराम को चुनौती देना चाहते थे
कारण: लक्ष्मण ने मुसकराकर उपहास भरे वचन बोले क्योंकि वे परशुराम को चुनौती देना चाहते थे। वे साहस दिखा रहे थे और डरने के बजाय व्यंग्यपूर्ण उत्तर दे रहे थे।
मेरी समझ, मेरे विचार
नीचे दिए गए प्रश्नों पर चर्चा कीजिए और उनके उत्तर लिखिए—
Q1. “अरध निमेष कलप सम बीता” पंक्ति का भाव स्पष्ट करते हुए बताइए कि कविता में यह किसके संदर्भ में कहा गया है और क्यों?
उत्तर: “अरध निमेष कलप सम बीता” पंक्ति सीता के संदर्भ में कही गई है। परशुराम के क्रोध से सीता बहुत चिंतित थीं। उनके लिए हर क्षण बहुत लंबा और भारी लग रहा था, मानो एक पल ही युग के समान हो गया हो। यह उनकी चिंता और भय को स्पष्ट करता है।
Q2. “सो बिलगाउ बिहाइ समाजा। न त मारे जैहहिं सब राजा॥” पंक्ति के आधार पर बताइए कि परशुराम द्वारा दी गई इस चेतावनी का सभा में उपस्थित राज-समाज पर क्या प्रभाव पड़ा होगा? तर्क सहित उत्तर दीजिए।
उत्तर: “सो बिलगाउ बिहाइ समाजा। न त मारे जैहहिं सब राजा॥” पंक्ति से पता चलता है कि परशुराम ने सभा में उपस्थित राजाओं को चेतावनी दी थी। इस चेतावनी से राजाओं में भय और असुरक्षा का भाव पैदा हुआ होगा। वे सोचने लगे होंगे कि यदि परशुराम का क्रोध शांत न हुआ तो सबको दंड मिलेगा। इससे सभा का वातावरण तनावपूर्ण हो गया।
Q3. तुलसीदास ने राम और लक्ष्मण के माध्यम से एक ही परिस्थिति के प्रति दो अलग-अलग प्रतिक्रियाएँ दिखाई हैं। आपकी दृष्टि में परशुराम के क्रोध को शांत करने के लिए राम का ‘विनय’ का मार्ग उचित है या लक्ष्मण के ‘तर्क’ का? अपने उत्तर का उचित कारण और तर्क भी प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर: तुलसीदास ने राम और लक्ष्मण की अलग-अलग प्रतिक्रियाएँ दिखाई हैं। राम ने विनम्रता और धैर्य से परशुराम को शांत करने का प्रयास किया, जबकि लक्ष्मण ने तर्क और व्यंग्य से उत्तर दिया। मेरी दृष्टि में राम का विनय उचित है क्योंकि क्रोध को शांत करने के लिए धैर्य और नम्रता अधिक प्रभावी होती है। इससे विवाद सुलझता है और शांति बनी रहती है।
Q4. “हृदयँ न हरषु बिषादु कछु बोले श्रीरघुबीरु॥” श्रीराम के हृदय में न हर्ष था, न विषाद। यह उनके व्यक्तित्व के किन गुणों को दर्शाता है? उनका भावनात्मक संतुलन इस पूरे पाठ में उन्हें अन्य पात्रों से अलग कैसे स्थापित करता है?
उत्तर: “हृदयँ न हरषु बिषादु कछु बोले श्रीरघुबीरु॥” पंक्ति राम के भावनात्मक संतुलन को दर्शाती है। वे न तो अत्यधिक प्रसन्न हुए, न ही दुखी। इससे उनके धैर्य, गंभीरता और आत्मसंयम का पता चलता है। यही गुण उन्हें अन्य पात्रों से अलग और आदर्श बनाते हैं।
मेरी कल्पना, मेरे अनुमान
नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर अपनी कल्पना और अनुमान के आधार पर दीजिए—
Q1. कल्पना कीजिए कि आप जनक की सभा में उपस्थित एक राजा हैं। परशुराम जी के आगमन से लेकर उनके गमन तक की कथा अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर: यदि मैं जनक की सभा में उपस्थित एक राजा होता तो परशुराम जी के आगमन से सभा का वातावरण अचानक गंभीर और भयपूर्ण हो जाता। उनके तेज और क्रोध से सभी राजाओं के मन में डर बैठ जाता। वे शिवधनुष के टूटने पर कठोर वचन बोलते और सभा में उपस्थित सभी को दोष देते। लक्ष्मण व्यंग्यपूर्ण उत्तर देते जिससे परशुराम और अधिक क्रोधित हो जाते। इस स्थिति में राम शांत और विनम्र बने रहते, वे परशुराम को आदरपूर्वक समझाते। अंत में राम की विनम्रता और विश्वामित्र की समझाइश से परशुराम का क्रोध शांत होता और वे आशीर्वाद देकर सभा से चले जाते।
Q2. “अति डरु उतरु देत नृपु नाहीं। कुटिल भूप हरषे मन माहीं॥” जनक द्वारा डर से चुप रहने पर अन्य राजा मन में प्रसन्न क्यों हुए होंगे?
(संकेत— सोचिए, यह मनुष्य के व्यवहार की किस सच्चाई को उजागर करता है?)
उत्तर: जनक डर के कारण मौन रहे और उत्तर नहीं दे पाए। यह देखकर अन्य राजाओं के मन में प्रसन्नता हुई क्योंकि उन्हें लगा कि अब परशुराम का क्रोध केवल जनक पर केंद्रित रहेगा और वे स्वयं बच जाएँगे। यह मनुष्य के व्यवहार की सच्चाई को उजागर करता है कि लोग अक्सर दूसरों की कठिनाई देखकर अपने बचाव पर संतोष महसूस करते हैं। यह स्वार्थ और आत्मरक्षा की प्रवृत्ति को दिखाता है।
कविता का सौंदर्य
यह कविता तुलसीदास द्वारा रचित महाकाव्य रामचरितमानस के ‘बालकांड’ का एक अंश है, जहाँ शिव-धनुष के टूटने से क्रोधित परशुराम के रोष भरे वाक्यों का उत्तर लक्ष्मण व्यंग्य-वचनों से देते हैं। दोनों के बीच के ये संवाद कविता में नाटकीयता उत्पन्न करते हैं। संवादों के माध्यम से ही पूरी कविता का कथात्मक विकास होता है, संवाद ही चरित्र का निर्माण करते हैं और संवादों से ही भावों में विविधता भी आती है। इस प्रकार यह कविता काव्यात्मक विधा में संवाद-प्रस्तुति का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। नीचे कविता के संवादों की कुछ विशेषताएँ दी गई हैं। उन विशेषताओं को दर्शाने वाली पंक्तियों के उदाहरण कविता से ढूँढ़कर लिखिए।
संवादों की विशेषताएँ
- राम की विनम्रता
- परशुराम का रौद्र रूप
- लक्ष्मण का प्रत्युत्तर
- पौराणिक संदर्भ
- नाटकीयता
उत्तर: इस कविता में संवादों के माध्यम से कथा आगे बढ़ती है और पात्रों का स्वभाव स्पष्ट होता है। राम की विनम्रता उस समय दिखाई देती है जब वे परशुराम को शांत करने के लिए आदरपूर्वक कहते हैं— “होइहि केउ एक दास तुम्हारा”। परशुराम का रौद्र रूप उनके कठोर वचनों से प्रकट होता है— “अति रिस बोले बचन कठोरा”। लक्ष्मण का प्रत्युत्तर उनके व्यंग्य और मुस्कान से झलकता है— “सुनि मुनि बचन लखन मुसुकाने”। पौराणिक संदर्भ पूरे प्रसंग में है क्योंकि यह शिव-धनुष और परशुराम जैसे महापुरुषों से जुड़ा हुआ है। नाटकीयता तब उत्पन्न होती है जब सभा में भय, क्रोध, विनम्रता और व्यंग्य सब एक साथ दिखाई देते हैं, जिससे वातावरण जीवंत और रोचक बन जाता है।
भाव-पहचान एवं विश्लेषण
आपने पढ़ा कि राजा जनक की सभा में उपस्थित विभिन्न पात्रों की मनःस्थिति अलग-अलग है। नीचे दिए गए भावों/मनःस्थितियों को दर्शाने वाली पंक्तियों को कविता से चिन्हित कीजिए और बताइए कि यह भाव किस पात्र से संबंधित है और उसकी इस मनःस्थिति का कारण क्या है? आपकी सहायता के लिए एक उदाहरण नीचे दिया गया है।
चिंता, क्रोध, व्यग्रता, भय, संयम/विनम्रता, ईर्ष्या/कुटिलता
| भाव/मनःस्थिति | संबंधित पंक्ति | संबंधित पात्र | मनःस्थिति का कारण |
|---|---|---|---|
| चिंता | सब सुधि अब सँवरी बात बिगारी। | सीता की माता सुनयना | पुत्री सीता के भविष्य (विवाह) के प्रति आशंकित और चिंतित। |
- “अति डरु उतरु देत नृपु नाहीं।”
परशुराम के पूछने पर जनक का मौन भयजनित है या विवेकपूर्ण निर्णय? संवाद की स्थिति के आधार पर विश्लेषण कीजिए।
उत्तर:
| भाव/मनःस्थिति | संबंधित पंक्ति | संबंधित पात्र | मनःस्थिति का कारण |
|---|---|---|---|
| चिंता | सब सुधि अब सँवरी बात बिगारी। | सीता की माता सुनयना | पुत्री सीता के भविष्य (विवाह) के प्रति आशंकित और चिंतित। |
| भय | “अति डरु उतरु देत नृपु नाहीं” | राजा जनक | परशुराम के कठोर प्रश्नों और क्रोध से जनक भयभीत होकर मौन रहे। |
| क्रोध | “अति रिस बोले बचन कठोरा” | परशुराम | शिव-धनुष का टूटना उन्हें अपमान जैसा लगा और वे अत्यधिक क्रोधित हो गए। |
| व्यग्रता | “अरध निमेष कलप सम बीता” | सीता | परशुराम के क्रोध से सीता अत्यधिक व्यग्र थीं और उनके लिए हर क्षण बहुत लंबा लग रहा था। |
| संयम/विनम्रता | “होइहि केउ एक दास तुम्हारा” | श्रीराम | राम ने परशुराम को शांत करने के लिए विनम्रता और धैर्य से उत्तर दिया। |
| ईर्ष्या/कुटिलता | “कुटिल भूप हरषे मन माहीं” | अन्य राजा | वे प्रसन्न हुए क्योंकि उन्हें लगा कि अब परशुराम का क्रोध जनक पर केंद्रित रहेगा और वे स्वयं बच जाएँगे। |
काव्य-पंक्ति और भाव
“रे नृप बालक काल बस बोलत तोहि न सँभार।
धनुही सम त्रिपुरारि धनु बिदित सकल संसार॥”
(क) यदि आप इन पंक्तियों को मंच पर बोलते, तो आपके चेहरे पर कौन-सा भाव होता?
उत्तर: इन पंक्तियों को बोलते समय चेहरे पर क्रोध और कठोरता का भाव होता। परशुराम का रौद्र रूप दिखाने के लिए आँखें लाल, भौंहें तनी हुई और स्वर कठोर होता। इससे उनके उग्र स्वभाव और अपमान सहन न करने की प्रवृत्ति स्पष्ट होती है।
(ख) आपने अनुभव किया होगा कि इस कविता में परिस्थितिवश प्रत्येक पात्र एक अलग भाव का प्रतिनिधि बन जाता है। निम्नलिखित पात्रों को आप कौन-कौन से भावों द्वारा प्रदर्शित करेंगे—
- परशुराम
- राजा जनक
- लक्ष्मण
- राम
- सभा में उपस्थित अन्य राजा
उत्तर:
- परशुराम: क्रोध और रौद्र रूप।
- राजा जनक: भय और असमंजस।
- लक्ष्मण: साहस और व्यंग्य।
- राम: संयम और विनम्रता।
- सभा में उपस्थित अन्य राजा: ईर्ष्या और कुटिलता।
विषयों का संवाद
Q1. सभा में परशुराम के प्रति राम के व्यवहार से उनकी विनम्रता, मर्यादा, धीरता और उदात्त चरित्र के संबंध में पता चलता है, जो किसी भी कुशल शासक के लिए आवश्यक है। आपको किन-किन परिस्थितियों में इन विशेषताओं का परिचय देना पड़ता है? चर्चा कीजिए और लिखिए।
उत्तर: जब किसी सभा या बैठक में विवाद हो और लोग क्रोधित हों, तब विनम्रता और धीरता से स्थिति संभालनी पड़ती है। कठिन निर्णय लेते समय मर्यादा और संयम दिखाना आवश्यक होता है। संकट या तनावपूर्ण समय में धैर्य और उदात्त चरित्र से ही शांति बनी रहती है। इससे स्पष्ट होता है कि शासक या नेता को हर परिस्थिति में संतुलित और मर्यादित रहना चाहिए।
Q2. कविता में वर्णित प्रसंग सीता-स्वयंवर की सभा का है। प्राचीन भारतीय समाज में वर-चयन के लिए स्वयंवर की प्रथा प्रचलित थी। इसके अनेक उदाहरण मिलते हैं। ऐसी किसी एक पौराणिक, ऐतिहासिक आदि घटना/प्रसंग का वर्णन कीजिए जिससे स्वयंवर-विधि द्वारा विवाह की जानकारी मिलती है।
उत्तर: महाभारत में द्रौपदी-स्वयंवर इसका उदाहरण है। द्रौपदी ने शर्त रखी थी कि जो राजकुमार धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाकर लक्ष्य भेदेगा वही उसका पति बनेगा। अर्जुन ने यह कार्य सफलतापूर्वक किया और द्रौपदी का स्वयंवर अर्जुन के साथ हुआ। इससे स्पष्ट होता है कि प्राचीन समाज में स्वयंवर द्वारा वर-चयन की परंपरा थी, जहाँ कन्या को अपने पति चुनने का अधिकार मिलता था।
सृजन
Q1. परशुराम के क्रोध को देखकर सीता और उनकी माता सुनयना दोनों चिंतित हैं और सीता के लिए एक-एक पल युग के समान भारी और लंबा प्रतीत हो रहा है। उनकी मनःस्थिति का अनुमान लगाते हुए उस क्षण दोनों के बीच चल रहा मौन संवाद लिखिए।
उत्तर: उस समय सीता की आँखों में भय और चिंता थी। वह मन ही मन अपनी माता से कह रही थीं— “माँ, यह पल कितना भारी है, क्या सब ठीक होगा?” सुनयना भी मौन थीं, पर उनके मन में यही विचार था— “बेटी, धैर्य रखो, भगवान राम सब संभाल लेंगे।” इस मौन संवाद में चिंता और आशंका दोनों का भाव स्पष्ट होता है।
Q2. सभा में हो रहे संवाद को दूर बैठी सीता, राजा जनक और अन्य लोग भी सुन रहे थे। अपनी कल्पना और अनुमान के आधार पर लिखिए कि उस समय सीता के मन में किस तरह के भाव उत्पन्न हो रहे होंगे? सीता के दृष्टिकोण से पूरी घटना का विश्लेषण कीजिए।
(संकेत— लक्ष्मण के प्रत्युत्तर पर चिंता, गर्व, हँसी, भय, शंका इत्यादि)
उत्तर: सीता के मन में कई भाव एक साथ उठ रहे थे। लक्ष्मण के व्यंग्यपूर्ण उत्तर पर उन्हें चिंता हुई कि कहीं परशुराम और अधिक क्रोधित न हो जाएँ। साथ ही उन्हें गर्व भी था कि राम और लक्ष्मण इतने साहसी हैं। कभी-कभी उनके मन में हँसी भी आती थी, पर तुरंत भय और शंका उन्हें घेर लेती थी। निष्कर्ष: सीता की मनःस्थिति उस समय मिश्रित थी— चिंता, गर्व, भय और आशंका सब एक साथ।
Q3. कविता में सभा में उपस्थित राजाओं ने अपनी वीरता, पराक्रम आदि का उल्लेख करते हुए अपना परिचय दिया है। यदि आपको अपना परिचय देना हो तो आप अपना परिचय किस प्रकार देना उचित समझेंगे? अपना परिचय देते हुए कुछ वाक्य लिखिए, जिससे आपके व्यक्तित्व की महत्त्वपूर्ण बातों का पता चलता हो।
उत्तर: मेरा परिचय इस प्रकार होगा— “मैं अनुशासन और परिश्रम को अपना बल मानता हूँ। शिक्षा और ज्ञान मेरी सबसे बड़ी शक्ति है। मैं कठिनाइयों में धैर्य रखता हूँ और दूसरों की सहायता करना अपना कर्तव्य समझता हूँ। यही मेरा व्यक्तित्व है।”
व्याकरण की बात
नीचे दी गई पंक्तियों को ध्यान से पढ़िए—
- “देखत भृगुपति बेषु कराला।”
- “बोले परसु धरहिं अपमाने॥”
- “सुनि रिसाइ कह भृगुकुलकेतू।”
यहाँ परशुराम को विभिन्न नामों से संबोधित किया गया है, जैसे— भृगुपति, परसुधर और भृगुकुलकेतू। आप इस कविता में अनेक विशेषताएँ देख सकते हैं, जैसे— दोहा-चौपाई का क्रम से होना, बिना वक्ता का नाम बताए उनका कथन कह देना, मुहावरों का प्रयोग करना आदि। नीचे इस कविता की कुछ विशेषताएँ और उनके एक-एक उदाहरण दिए गए हैं। एक-एक उदाहरण आप लिखिए।
| विशेषता | अर्थ | उदाहरण |
|---|---|---|
| अनुप्रास अलंकार | एक ही वर्ण की बार-बार आवृत्ति | अरि उर करनी करि करि करिअ लराई। |
| अतिशयोक्ति अलंकार | बात को बढ़ा-चढ़ाकर कहना | अरध निमेष कलप सम बीता। |
| रूपक अलंकार | उपमेय में उपमान का आरोप करना | पद सरोज मिले दोउ भाई। |
उत्तर:
- अनुप्रास अलंकार का उदाहरण: अनुप्रास अलंकार में एक ही वर्ण बार-बार आता है। उदाहरण: “अरि उर करनी करि करि करिअ लराई।”
- अतिशयोक्ति अलंकार का उदाहरण: अतिशयोक्ति अलंकार में बात को बढ़ा-चढ़ाकर कहा जाता है। उदाहरण: “अरध निमेष कलप सम बीता।”
- रूपक अलंकार का उदाहरण: रूपक अलंकार में उपमेय पर उपमान का आरोप होता है। उदाहरण: “पद सरोज मिले दोउ भाई।”
बहुभाषिता
यह कविता अवधी भाषा में लिखी गई है, जो हिंदी भाषा का ही एक स्वरूप है और उत्तर प्रदेश के अनेक स्थानों पर बोली जाती है। कविता में ऐसे बहुत से शब्द आए हैं, जो अवधी भाषा के हैं। ऐसे शब्दों को पहचानकर उनके खड़ी बोली हिंदी रूप लिखिए। साथ ही आपकी भाषा में इनके लिए कौन-से शब्द प्रयुक्त होते हैं, उन्हें भी लिखिए।
उदाहरण –
| अवधी शब्द | खड़ी बोली का शब्द | मेरी भाषा में शब्द |
|---|---|---|
| कोही | क्रोधी | |
| बेषु | वेश |
उत्तर:
| अवधी शब्द | खड़ी बोली का शब्द | मेरी भाषा में शब्द |
|---|---|---|
| कोही | क्रोधी | रागीट |
| बेषु | वेश | पोशाख |
| नृपु | राजा | राजा |
| धनुहि | धनुष | धनुष्य |
| रिसाइ | क्रोधित | रागावला |
| भूप | राजा/शासक | भूपती |
| मुसुकाने | मुस्कराना | हसणे |
| दास | सेवक | नोकर |
लोक में भाषा
नीचे कोष्ठक में कविता से कुछ शब्द चुनकर दिए गए हैं। उन शब्दों से संबंधित लोकोक्तियाँ और उनका अर्थ लिखकर स्वतंत्र वाक्यों में प्रयोग कीजिए। आपकी सहायता के लिए एक उदाहरण नीचे दिया गया है।
मन राम राजा बात सिरु (सिर)
उदाहरण –
| शब्द | लोकोक्ति | अर्थ |
|---|---|---|
| मन | मन के जीते जीत है, मन के हारे हार। | आत्मविश्वास, साहस और मनोबल से सफलता निश्चित मिलती है। |
उत्तर:
| शब्द | लोकोक्ति | अर्थ |
|---|---|---|
| मन | मन के जीते जीत है, मन के हारे हार। | आत्मविश्वास, साहस और मनोबल से सफलता निश्चित मिलती है। |
| राम | राम नाम सत्य है | राम नाम सत्य है, यह लोकोक्ति हमें मृत्यु की सच्चाई याद दिलाती है। |
| राजा | राजा का न्याय सबको मान्य | गाँव में राजा का न्याय सबको मान्य होता था। |
| बात | बात का बतंगड़ बनाना | उसने छोटी सी गलती पर बात का बतंगड़ बना दिया। |
| सिरु (सिर) | सिर पर चढ़ना | उसका गुस्सा सिर पर चढ़ गया और उसने सबको डाँट दिया। |
गद्य-रूप
नीचे लिखी चौपाई को पढ़िए—
“नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा॥
आयसु काह कहिअ किन मोही। सुनि रिसाइ बोले मुनि कोही॥”
इस चौपाई को हम गद्य-रूप में भी लिख सकते हैं। इसमें राम परशुराम से विनम्रतापूर्वक कहते हैं— हे नाथ! शिव-धनुष को तोड़ने वाला आपका ही कोई एक दास होगा। आपकी क्या आज्ञा है, मुझसे क्यों नहीं कहते? राम की यह बात सुनकर क्रोधित परशुराम कहते हैं।
अब आप नीचे दी गई चौपाई को गद्य-रूप में लिखिए—
“अति डरु उतरु देत नृपु नाहीं। कुटिल भूप हरषे मन माहीं॥
सुर मुनि नाग नगर नर नारी। सोचहिं सकल त्रास उर भारी॥”
उत्तर: परशुराम के कठोर प्रश्नों से राजा जनक अत्यधिक भयभीत हो गए और वे कोई उत्तर नहीं दे पाए। अन्य कुटिल राजा मन ही मन प्रसन्न हुए कि अब दोष जनक पर ही आएगा। देवता, ऋषि, नाग, नगरवासी और स्त्रियाँ सभी चिंतित हो उठे। सभा में उपस्थित हर व्यक्ति के हृदय में भय और चिंता का भारी बोझ था।
गतिविधियाँ
Q1. यह कविता संवाद का सुंदर उदाहरण है। तालिका में दिए गए कथनों को पढ़कर बताइए कि कौन-सा कथन किसका हो सकता है। अपनी समझ से सही (✓) का चिह्न लगाइए।
| कथन | राम | लक्ष्मण | परशुराम | जनक | सीता की माता |
|---|---|---|---|---|---|
| शिव के धनुष को तोड़ने वाला आपका कोई दास ही हो सकता है। | |||||
| विधाता ने बनी-बनाई बात बिगाड़ दी। | |||||
| सेवक वह होता है जो सेवा का काम करे। | |||||
| इस कारण ये सब राजा आए हैं। | |||||
| बचपन में हमने ऐसी बहुत-सी धनुहियाँ तोड़ डाली हैं। | |||||
| क्या आज्ञा है, मुझसे क्यों नहीं कहते? | |||||
| कहो जनक, किस कारण यह भीड़ है? | |||||
| इसी धनुष पर इतनी ममता क्यों! |
| कथन | राम | लक्ष्मण | परशुराम | जनक | सीता की माता |
|---|---|---|---|---|---|
| शिव के धनुष को तोड़ने वाला आपका कोई दास ही हो सकता है। | ✓ | ||||
| विधाता ने बनी-बनाई बात बिगाड़ दी। | ✓ | ||||
| सेवक वह होता है जो सेवा का काम करे। | ✓ | ||||
| इस कारण ये सब राजा आए हैं। | ✓ | ||||
| बचपन में हमने ऐसी बहुत-सी धनुहियाँ तोड़ डाली हैं। | ✓ | ||||
| क्या आज्ञा है, मुझसे क्यों नहीं कहते? | ✓ | ||||
| कहो जनक, किस कारण यह भीड़ है? | ✓ | ||||
| इसी धनुष पर इतनी ममता क्यों! | ✓ |
Q2. रामचरितमानस के इस प्रसंग का मंचन लोकनाट्य, रामलीला और कठपुतली कला में बड़ी जीवंतता से किया जा सकता है। कलात्मक तकनीकों (ध्वनि, भाव, संगीत, वेशभूषा) का उपयोग करते हुए कविता को एक दृश्य-नाटक के रूप में प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:
इस प्रसंग को मंच पर प्रस्तुत करते समय—
- ध्वनि: परशुराम के प्रवेश पर तेज नगाड़े और शंख की ध्वनि।
- भाव: परशुराम का क्रोध, जनक का भय, लक्ष्मण का साहस, राम की विनम्रता।
- संगीत: पृष्ठभूमि में गंभीर और तनावपूर्ण संगीत।
- वेशभूषा: परशुराम का कराल रूप, राम-लक्ष्मण का राजकुमार रूप, जनक का राजसी वेश।
Q3. ‘कठिन परिस्थितियों में भी सत्य कहने का साहस करना आवश्यक है।’ इस विषय पर कक्षा में एक परिचर्चा अथवा वाद-विवाद गतिविधि के माध्यम से अपने विचार साझा कीजिए।
उत्तर: कठिन परिस्थितियों में सत्य बोलना साहस का काम है। यदि हम सत्य छिपाते हैं तो समस्या और बढ़ती है। सत्य कहने से विश्वास और न्याय बना रहता है। परशुराम के प्रसंग में भी राम ने विनम्रता से सत्य कहा और स्थिति संभाली। निष्कर्ष: इससे स्पष्ट होता है कि सत्य बोलना ही सबसे बड़ा साहस है और यही समाज में आदर्श स्थापित करता है।
मेरी पहेली
पाठ में से चुनकर कुछ शब्द नीचे दिए गए हैं। अब अपने समूह में मिलकर ऐसी पहेलियाँ बनाइए, जिनके उत्तर निम्नलिखित हों—
समाचार, धनुष, मन, नाग, नगर
उत्तर:
| समाचार | “हर सुबह आता, सबको बताता, दुनिया भर की बातें सुनाता।” |
| धनुष | “तार से जुड़ा, बाण चलाए, वीरों के हाथ में शक्ति बनाए।” |
| मन | “न दिखे आँखों से, न छुए हाथों से, पर हर काम में साथ रहे।” |
| नाग | “फन उठाए, फुफकार सुनाए, जंगल में डर सबको दिखाए।” |
| नगर | “घर-घर जुड़ा, लोग रहें खड़ा, सड़कों पर जीवन सदा।” |
भाषा संगम
“अति रिस बोले बचन कठोरा। कहु जड़ जनक धनुष कै तोरा॥”
नीचे ‘धनुष’ शब्द के लिए संविधान की आठवीं अनुसूची में सम्मिलित कुछ भारतीय भाषाओं में प्रयुक्त शब्दों की सूची दी गई है—
कमान (हिंदी); धनुः, चापम् (संस्कृत); धणु (पंजाबी); कमान (क़ौस) (उर्दू); कमान (कश्मीरी); धनुषु, कमानु (सिंधी); धनुष्य (मराठी); धनुष, कामठुं (गुजराती); धनुश (कोंकणी); धनु (नेपाली); धनुक (बांग्ला); धनु (असमिया); लिरुर (मणिपुरी); धनुष, धनु, कामुचाक (ओड़िया); धनुस्सु, विल्लु (तेलुगु); विल् (तमिल); धनुस्सु, विल्लु (मलयालम); बिल्लु, धनुष (कन्नड़)
- इनके अतिरिक्त यदि आप ‘धनुष’ शब्द को किसी और भाषा में भी जानते हैं, तो उस भाषा में भी लिखिए।
- उपर्युक्त वाक्य को अपनी मातृभाषा में भी लिखिए।
https://shabd.education.gov.in/lexicon.jsp
उत्तर:
“अति रिस बोले बचन कठोरा। सांग जनक धनुष्य कोणी तोडले?”
(मराठी में: “जनका, धनुष्य कोणी तोडले हे सांग.”)
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