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Sanskrit Class 9 Chapter 1 Question Answer – सत्यं शिवं सुन्दरं संस्कृतम् विद्यार्थियों को पाठ के प्रश्नों और उत्तरों को सरल एवं स्पष्ट रूप से समझने में मदद करता है। इस अध्याय में संस्कृत भाषा की विशेषताओं, उसकी समृद्ध परंपरा, ज्ञान-विज्ञान में योगदान तथा भारतीय संस्कृति में उसके महत्व को बताया गया है। यहाँ दिए गए प्रश्न-उत्तर पाठ के आधार पर सरल भाषा में तैयार किए गए हैं, ताकि विद्यार्थी परीक्षा की तैयारी आसानी से कर सकें।

Sanskrit Class 9 Chapter 1 Question Answer Sharada सत्यं शिवयं सुन्दरयं सयंस्कृतम
सर्वं शब्देन भासते।
| शब्दः | अर्थः | हिन्दी | English | मातृभाषया अर्थं लिखत। |
|---|---|---|---|---|
| आमुष्मम् (नपुं.प्र.ए.व.) | परलोकस्य | परलोक का | Of the other world | |
| उत्कर्षदम् (नपुं.प्र.ए.व.) | उत्कर्षं ददाति इति | उन्नति देने वाली | Bestower of excellence | |
| उद्वेलनम् (उद् + √वेल् + ल्युट्, नपुं.प्र.ए.व.) | उद्यत्कृत् | उत्थान करने वाला | Awakener | |
| ऐहिकम् (नपुं.प्र.ए.व.) | इह लोके भवम्, संसारस्य | संसार का | Of this world | |
| कर्मदम् (नपुं.प्र.ए.व.) | कर्म ददाति इति | पुरुषार्थ देने वाली | Bestower of righteous action | |
| चारु (नपुं.प्र.ए.व.) | सुन्दरम् | मनोहर | Beautiful | |
| परिष्कारम् (नपुं.प्र.ए.व.) | संस्कारम् | शुद्ध करने वाली | Refiner | |
| पुञ्जः (पुं.प्र.ए.व.) | राशिः, समूहः | समूह | Clump | |
| प्रभा (स्त्री.प्र.ए.व.) | दीप्तिः, प्रकाशः | प्रकाश | Light | |
| भक्तिदम् (नपुं.प्र.ए.व.) | भक्तिं ददाति इति | भक्ति को देने वाली | Bestower of Bhakti | |
| माधुर्यधारा (स्त्री.प्र.ए.व.) | माधुर्यस्य धारा इति | मधुर रस की धारा | Flow of Sweetness | |
| विस्तारकम् (नपुं.प्र.ए.व.) | विस्तारं करोति/वितनोति यत् | विस्तार करने वाली | Expander | |
| लीलावनम् (नपुं.प्र.ए.व.) | लीलायाः वनम् | क्रीड़ा का उद्यान | Garden for play | |
| सत्पथः (पुं.प्र.ए.व.) | सन्मार्गः | सत्य मार्ग | Noble Path | |
| सन्दोहः (पुं.प्र.ए.व.) | समूहः | समूह | Group |
उत्तरम्:
| शब्दः | अर्थः | हिन्दी | English | मातृभाषया अर्थं लिखत। |
|---|---|---|---|---|
| आमुष्मम् (नपुं.प्र.ए.व.) | परलोकस्य | परलोक का | Of the other world | परलोक |
| उत्कर्षदम् (नपुं.प्र.ए.व.) | उत्कर्षं ददाति इति | उन्नति देने वाली | Bestower of excellence | उन्नति |
| उद्वेलनम् (उद् + √वेल् + ल्युट्, नपुं.प्र.ए.व.) | उद्यत्कृत् | उत्थान करने वाला | Awakener | जागरण |
| ऐहिकम् (नपुं.प्र.ए.व.) | इह लोके भवम्, संसारस्य | संसार का | Of this world | संसार |
| कर्मदम् (नपुं.प्र.ए.व.) | कर्म ददाति इति | पुरुषार्थ देने वाली | Bestower of righteous action | पुरुषार्थ |
| चारु (नपुं.प्र.ए.व.) | सुन्दरम् | मनोहर | Beautiful | सुंदर |
| परिष्कारम् (नपुं.प्र.ए.व.) | संस्कारम् | शुद्ध करने वाली | Refiner | शुद्धि |
| पुञ्जः (पुं.प्र.ए.व.) | राशिः, समूहः | समूह | Clump | समूह |
| प्रभा (स्त्री.प्र.ए.व.) | दीप्तिः, प्रकाशः | प्रकाश | Light | प्रकाश |
| भक्तिदम् (नपुं.प्र.ए.व.) | भक्तिं ददाति इति | भक्ति को देने वाली | Bestower of Bhakti | भक्ति |
| माधुर्यधारा (स्त्री.प्र.ए.व.) | माधुर्यस्य धारा इति | मधुर रस की धारा | Flow of Sweetness | मधुरता |
| विस्तारकम् (नपुं.प्र.ए.व.) | विस्तारं करोति/वितनोति यत् | विस्तार करने वाली | Expander | विस्तार |
| लीलावनम् (नपुं.प्र.ए.व.) | लीलायाः वनम् | क्रीड़ा का उद्यान | Garden for play | खेल उद्यान |
| सत्पथः (पुं.प्र.ए.व.) | सन्मार्गः | सत्य मार्ग | Noble Path | सत्य मार्ग |
| सन्दोहः (पुं.प्र.ए.व.) | समूहः | समूह | Group | समूह |
अत्र इदम् अवधेयम्
कविकाव्यपरिचयः
वाराणस्यां विद्यमानस्य सार्वभौमसंस्कृतप्रचारकार्यस्य संस्थापकः पण्डितः वासुदेव-शास्त्री-द्विवेदीमहाभागः गीतस्यास्य रचयिता। महाशयेन सरलसंस्कृतेन बहवः ग्रन्थाः विरचिताः, अपि च संस्कृतप्रचारार्थं विपुलं साहित्यं च प्रकाशितम्। परमार्थसुधा इति संस्कृतपत्रिकायाः अपि एतेन सम्पादनम् आसीत्। सुरभारतीसन्देशः, विश्वगीयसंस्कृतकविसम्मेलनम्, भोजराजस्य संस्कृतसाम्राज्यम्, कौत्सस्य गुरुदक्षिणा चेत्यादयो ग्रन्थाः अस्य कृतिषु सुप्रसिद्धाः सन्ति।
वासुदेव शास्त्री द्विवेदी वाराणसी में संस्कृत प्रचार के संस्थापक थे। वे इस गीत के रचयिता भी हैं। उन्होंने सरल संस्कृत में ग्रंथ लिखे और साहित्य प्रकाशित किया। परमार्थसुधा पत्रिका का संपादन भी किया। उनके प्रसिद्ध ग्रंथ हैं — सुरभारतीसन्देश, विश्वगीय संस्कृत कवि सम्मेलन, भोजराज का संस्कृत साम्राज्य, कौत्स की गुरुदक्षिणा।
अभ्यासाद् जायते सिद्धिः
१. छात्राः सम्मिलित्वा पृथक् पृथक् पञ्चानां छात्राणां लघुसमूहान् निर्माणयति-गति-लयपूर्वकं गीतगानस्य अभ्यासं करिष्यन्ति।
उत्तरम्: छात्राः सम्मिलित्वा लघुसमूहान् निर्माय गति-लयपूर्वकं गीतगानस्य अभ्यासं करिष्यन्ति। एषः अभ्यासः तेषां सामूहिकगायनकौशलं वर्धयति, सहकार्यभावं च जनयति।
विद्यार्थी आपस में मिलकर पाँच‑पाँच के छोटे समूह बनाएँगे और ताल‑लय के साथ गीत गाने का अभ्यास करेंगे। इस अभ्यास से उनका सामूहिक गायन कौशल बढ़ेगा और सहयोग की भावना भी विकसित होगी।
२. एकपदेन उत्तरं लिखत —
यथा — ज्ञानपुञ्जप्रभादर्शकं किम्? …….संस्कृतम्…..
(क) संस्कृतं कस्याः साधकम्? ………………………………
उत्तरम्: भारतीयैकतायाः।
(ख) सर्वदा संस्कृतं कस्य सन्दोहम्? ………………………………
उत्तरम्: आनन्दस्य।
(ग) संस्कृतं कस्य प्रेरणादायकम्? ………………………………
उत्तरम्: सत्पथस्य।
(घ) संस्कृतं कासां परिष्कारकम्? ………………………………
उत्तरम्: सर्ववाणीनाम्
(ङ) कस्य विस्तारकं संस्कृतम्? ………………………………
उत्तरम्: विश्वबन्धुत्वस्य।
३. अधोलिखितप्रश्नानाम् उत्तराणि पूर्णवाक्येन लिखत —
(क) सर्वतः कस्याः संस्थापकं संस्कृतम्?
उत्तरम्: संस्कृतं सर्वतः शान्तिसंस्थापकम् अस्ति।
(ख) कीदृशं व्रतं संस्कृतम्?
उत्तरम्: संस्कृतं त्यागसन्तोषसेवाव्रतम् अस्ति।
(ग) कयोः सम्मेलनं संस्कृतम्?
उत्तरम्: संस्कृतं ज्ञानविज्ञानयोः सम्मेलनम् अस्ति।
(घ) संस्कृतं कस्य चमत्कारम्?
उत्तरम्: संस्कृतं विश्वचेतसः चमत्कारकम् अस्ति।
(ङ) केषां यशः स्मारकं संस्कृतम्?
उत्तरम्: संस्कृतं पूर्वजानां यशसः स्मारकम् अस्ति।
४. रिक्तस्थानानि पूरयन्तु —
यथा — ……………………-कारं संस्कृतम्।
(क) …………………… सम्पाद्यं संस्कृतम्।
उत्तरम्: भारतीयत्वं
(ख) …………………… दर्शनं संस्कृतम्।
उत्तरम्: ज्ञानपुञ्जप्रभा
(ग) …………………… संस्कारं संस्कृतम्।
उत्तरम्: सर्वमस्तिष्क
(घ) कर्मदं …………………… भक्तिदं संस्कृतम्।
उत्तरम्: ज्ञानदं
(ङ) सत्यनिष्ठं …………………… संस्कृतम्।
उत्तरम्: शिवं सुन्दरं
(च) शब्दलालित्य …………………… संस्कृतम्।
उत्तरम्: लीलावनं
५. मञ्जूषायाः पदानि उपयुज्य षड् वाक्यानि रचयत —
| वाणीपरिष्कारकः, एकता, सर्वतः, सेवा, सुन्दरम्, पूर्वजानाम्, सत्पथे प्रेरयितुम्, सर्वकल्याणाय, त्यागस्य, सन्तोषस्य, विश्वबन्धुत्वविस्तारकम् |
- यथा — ……………………………………………………………………..
- (क) ……………………………………………………………………..
- (ख) ……………………………………………………………………..
- (ग) ……………………………………………………………………..
- (घ) ……………………………………………………………………..
- (ङ) ……………………………………………………………………..
- (च) ……………………………………………………………………..
उत्तरम्:
- यथा — संस्कृतं सर्वतः सुन्दरम् अस्ति।
- (क) संस्कृतभाषा जनान् सत्पथे प्रेरयति।
- (ख) संस्कृतं विश्वबन्धुत्वविस्तारकम् अस्ति।
- (ग) संस्कृतं त्यागसन्तोषसेवारूपं व्रतम् अस्ति।
- (घ) संस्कृतं सर्वकल्याणाय हितकरं भवति।
- (ङ) संस्कृतं एकतायाः साधकम् अस्ति।
- (च) संस्कृतं वाणीपरिष्कारकम् अस्ति।
६. अधोलिखितानां समस्तपदानाम् उदाहरणानुसारं विग्रहं कुरुत —
- यथा — भारतीयैकतासाधकम् ……………………………………..
- (क) ज्ञानपुञ्जप्रभादर्शकम् ……………………………………..
- (ख) सर्ववाणीपरिष्कारकम् ……………………………………..
- (ग) विश्वबन्धुत्वविस्तारकम् ……………………………………..
- (घ) सर्वभूतैकताकारकम् ……………………………………..
- (ङ) शान्तिसंस्थापकम् ……………………………………..
- (च) ज्ञानविज्ञानसम्मेलनम् ……………………………………..
उत्तरम्:
- यथा — भारतीयैकतासाधकम् — भारतीयायाः एकतायाः साधकम्।
- (क) ज्ञानपुञ्जप्रभादर्शकम् — ज्ञानपुञ्जस्य प्रभायाः दर्शकम्।
- (ख) सर्ववाणीपरिष्कारकम् — सर्वासां वाणीनां परिष्कारकम्।
- (ग) विश्वबन्धुत्वविस्तारकम् — विश्वबन्धुत्वस्य विस्तारकम्।
- (घ) सर्वभूतैकताकारकम् — सर्वेषां भूतानाम् एकतायाः कारकम्।
- (ङ) शान्तिसंस्थापकम् — शान्तेः संस्थापकम्।
- (च) ज्ञानविज्ञानसम्मेलनम् — ज्ञानविज्ञानयोः सम्मेलनम्।
७. प्रदत्तमञ्जूषातः पर्यायपदानि चित्वा रिक्तस्थानानि लिखत —
| उल्लासः | स्मरणः | जगत् | अनुपमा | तेजोराशयः | मानम् |
(क) विद्वांसः …………………… भवन्ति।
उत्तरम्: विद्वांसः तेजोराशयः भवन्ति।
(ख) सूर्यस्य …………………… सर्वेषां प्राणिनां कृते हितकरः भवति।
उत्तरम्: सूर्यस्य किरणः सर्वेषां प्राणिनां कृते हितकरः भवति।
(ग) ईश्वरं स्मृत्वा …………………… उपजायते।
उत्तरम्: ईश्वरं स्मृत्वा उल्लासः उपजायते।
(घ) विद्यायाः …………………… अजरं भवति।
उत्तरम्: विद्यायाः मानम् अजरं भवति।
(ङ) प्रकृतेः शोभा …………………… विद्यते।
उत्तरम्: प्रकृतेः शोभा अनुपमा विद्यते।
(च) यत् …………………… एकनीडं भवति।
उत्तरम्: यत् जगत् एकनीडं भवति।
८. अधोलिखितानां मेलनं कुरुत —
(क) भारतीयैकतायाः — १. विस्तारकम्
(ख) सत्पथे — २. साधकम्
(ग) त्यागसन्तोषसेवारूपम् — ३. दर्शनम्
(घ) ज्ञानपुञ्जप्रभायाः — ४. प्रेरणादायकम्
(ङ) विश्वबन्धुत्वस्य — ५. व्रतम्
उत्तरम्:
(क) भारतीयैकतायाः — २. साधकम्
(ख) सत्पथे — ४. प्रेरणादायकम्
(ग) त्यागसन्तोषसेवारूपम् — ५. व्रतम्
(घ) ज्ञानपुञ्जप्रभायाः — ३. दर्शनम्
(ङ) विश्वबन्धुत्वस्य — १. विस्तारकम्
स्वाध्यायान् मा प्रमदः।
पञ्चशीलं किम्?
बौद्धधर्मे सदाचरणस्य परिपालनाय पञ्च शीलानि सन्ति। येषाम् आचरणं मनुष्याणाम् अत्यन्तं लाभाय अस्ति। तेषां विवरणमस्ति —
१. अस्तेयम्
२. अहिंसा
३. ब्रह्मचर्यम्
४. सत्यम्
५. मादकद्रव्याणां परिहारः।
| श्लोकः एतद्देशप्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मनः। स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्वमानवाः॥ संस्कृतं संस्कृतिमूलं ज्ञानविज्ञानवारिधिः। वेदतत्त्वार्थसञ्जुष्टं लोकालोककरं शिवम्॥ सत्याहिंसागुणैः श्रेष्ठा विश्वबन्धुत्वशिक्षिका। विश्वशान्तिसुखाधात्री भारतीयाः हि संस्कृतिः॥ |
उत्तरम्: बौद्धधर्मे सदाचरणस्य पालनाय पञ्च शीलानि सन्ति। तानि अस्तेयम्, अहिंसा, ब्रह्मचर्यम्, सत्यम् तथा मादकद्रव्याणां परिहारः इति सन्ति। एतेषाम् आचरणेन मनुष्याणां कल्याणं भवति।
यस्तु क्रियावान् मनुजः स विद्वान्।
१. “संस्कृताधारिता भारतीयैकता” इति एतं विषयम् आधृत्य एका भाषणप्रतियोगिता आयोजनीया। शिक्षकः भाषणप्रतियोगितायां निम्नाङ्कितानां बिन्दूनां समावेशं करिष्यति।
| अङ्कयोजना | ५ | ४ | ३ | २ | १ |
|---|---|---|---|---|---|
| प्रवाहः | प्रवाहपूर्वकं संवादं करोति। | केषुचित् बिन्दुषु विरामं करोति परन्तु सः सञ्चारं न बाधते। | केषुचित् बिन्दुषु विरामं करोति यतः सञ्चारं बाधते। | कदाचित् प्रायः विरामं करोति येन सञ्चारः कठिनः भवति। | सञ्चार एव न जायते। |
| शुद्धता | योग्यवाक्यसंरचना, | अत्यल्पाः व्याकरणदोषाः। | नैमित्तिकव्याकरणदोषाः। | त्रुटिपूर्णवाक्यसंरचनाः। | वाक्यसंरचना एव न ज्ञायमाना अस्ति। |
| शब्ददोषः | प्रासङ्गिकशब्दकोशस्य विविधतायाः उपयोगः। | शब्दावल्यां विविधतायाः उपयोगः। | प्रासङ्गिकसीमितशब्दकोशस्य उपयोगः। | सीमितशब्दकोशस्य उपयोगः। | द्वित्वतः एव शब्दाः प्रयुक्ताः। |
उत्तरम्: अस्य प्रश्नस्य मुख्यविषयः “संस्कृताधारिता भारतीयैकता” इति अस्ति। भाषणप्रतियोगितायां छात्रः प्रवाहपूर्वकं, शुद्धभाषया तथा विविधशब्दावल्याः प्रयोगेण भाषणं प्रस्तुतं करिष्यति। प्रवाहः, भाषाशुद्धता तथा शब्दप्रयोगः अस्य मूल्याङ्कनस्य मुख्याः आधाराः सन्ति।
२. विश्वबन्धुत्वभावनायाः विकासाय के मार्गाः अवलम्बनीयाः इति विषयम् अधिकृत्य सहपाठिभिः सह आलोचनां कुरुत।
उत्तरम्: विश्वबन्धुत्वभावनायाः विकासाय सर्वेषां जनानां प्रति प्रेमभावः, अहिंसा, सत्यं, सहयोगः च अवलम्बनीयाः। सर्वे जनाः परस्परं सम्मानं कृत्वा एकतया शान्तिपूर्वकं च जीवनं यापयेयुः।
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