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Sanskrit Class 9 Chapter 2 Question Answer – सुखस्य मूलं धर्मः, धर्मस्य मूलम् अर्थः विद्यार्थियों को अध्याय के प्रश्नों और उत्तरों को सरल एवं स्पष्ट रूप में समझने में मदद करता है। इस अध्याय में सुख, धर्म, अर्थ, कर्तव्य और जीवन में सही आचरण के महत्व को समझाया गया है। यहाँ सभी प्रश्नों के उत्तर पाठ के आधार पर आसान भाषा में दिए गए हैं, जिससे विद्यार्थी विषय को समझने के साथ-साथ परीक्षा की तैयारी भी प्रभावी ढंग से कर सकते हैं।

Sanskrit Class 9 Chapter 2 Question Answer सुखस्य मूलं धर्मः, धर्मस्य मूलम् अर्थः।
सर्वं शब्देन भासते
| शब्दः | अर्थः | हिन्दी | English | मातृभाषया अर्थं लिखत |
|---|---|---|---|---|
| अपव्ययः (पुं.प्र.ए.व.) | व्यर्थव्ययः | अनावश्यक व्यय | Unnecessary expense | फालतू खर्च |
| अवाप्तुम् (अव + √आप् + तुमुन्, अव्ययम्) | प्राप्तुम् | प्राप्त करने के लिए | To get | पाने के लिए |
| अविच्छिन्नः (नञ् तत्पुरुषः, पुं.प्र.ए.व.) | न विच्छिन्नः | अटूट | Inseparable | बिना टूटे |
| अर्जितस्य (√अर्ज् + क्त, पुं.नं.ष.ए.व.) | उपार्जितस्य | कमाए हुए का | Of the earned | कमाई का |
| अर्थोपार्जनम् (षष्ठी तत्पुरुषः, नपुं.प्र.ए.व.) | अर्थस्य उपार्जनम् | धन कमाना | Earning | पैसा कमाना |
| आजीविका (स्त्री.प्र.ए.व.) | वृत्तिः | व्यवसाय | Livelihood | रोज़ी‑रोटी |
| आडम्बरपूर्णः (पुं.प्र.ए.व.) | पाखण्डयुक्तः | दिखावे से भरा | Ostentatious | दिखावा |
| आर्थिकव्यवहारः (पुं.प्र.ए.व.) | धनविषयकः व्यवहारः | आर्थिक लेन-देन | Financial behavior | पैसों का लेन‑देन |
| आर्थिकसाक्षरता (कर्मधारयः, स्त्री.प्र.ए.व.) | आर्थिकं साक्षरत्वम् | वित्तीय साक्षरता | Financial literacy | पैसों की समझ |
| आवृत्तिनिक्षेपः (पुं.प्र.ए.व.) | आवृत्तिनिक्षेपः | आवर्ती जमा | Recurring Deposit (RD) | बार‑बार जमा |
| उचितनिवेशम् (पुं.नं.द्वि.ए.व.) | साधुनिवेशम् | योग्य निवेश | Proper investment | सही निवेश |
| उद्धृत्य (उद् + √धृ + ल्यप्) | उद्धारणं कृत्वा | ऊपर उठाकर | By lifting up | उठाकर |
| औचित्यपूर्णः (पुं.प्र.ए.व.) | समुचितः | उपयुक्त | Justified | ठीक‑ठाक |
| कष्टार्जितधनस्य (कर्मधारयः, नपुं.नं.ष.ए.व.) | कष्टेन अर्जितम् कष्टार्जितं धनम्, तस्य | कष्ट से कमाए हुए धन का | Of the wealth earned with difficulty | मेहनत की कमाई |
| कालान्तरेण (नपुं.नं.तृ.ए.व.) | अन्यः कालः | तेन समय बीतने पर | By the course of time | समय के साथ |
| किसान-विकास-पत्रम् (नपुं.प्र.ए.व.) | कृषकस्य विकासः किसानविकासः | तदर्थं पत्रम् किसान विकास पत्र | Kisan Vikas Patra (KVP) | किसानों की बचत योजना |
| चक्रवृद्ध्यंशेन (तृतीया तत्पुरुषः, पुं.नं.तृ.ए.व.) | चक्रवृद्ध्या अंशेन | चक्रवृद्धि ब्याज से | By Compound Interest | ब्याज पर ब्याज |
| तुच्छकारणैः (कर्मधारयः, नपुं.नं.तृ.ब.व.) | तुच्छं कारणम्, तैः | निरर्थक कारणों से | For trivial reasons | छोटी‑मोटी वजह से |
| त्वरिताहारः (कर्मधारयः, पुं.प्र.ए.व.) | त्वरितः चासौ आहारः | शीघ्र आहार | Fast Food | जल्दी का खाना |
| नियतिनिक्षेपः (मध्यपदलोपी कर्मधारयः, पुं.प्र.ए.व.) | नियतकालिकः निक्षेपः | निश्चित अवधि के लिए जमा | Fixed Deposit (FD) | तय समय की जमा |
| न्यायपूर्णम् (तृतीया तत्पुरुषः, नपुं.प्र.ए.व.) | न्यायेन पूर्णम् | न्यायसंगत | Justified | सही‑न्याय वाला |
| पैकेजीकृतभोजनम् (कर्मधारयः, नपुं.प्र.ए.व.) | पैकेजीकृतं भोजनम् | डिब्बाबन्द खाना | Packaged food | पैक किया हुआ खाना |
| पूर्तये (स्त्री.च.ए.व.) | सम्पूर्तिनिमित्तम् | उपलब्ध कराने के लिए | To fulfill | पूरा करने के लिए |
| प्रदर्शनकारिपरिधानम् (कर्मधारयः, नपुं.प्र.ए.व.) | प्रदर्शनकारि परिधानम् | प्रदर्शनकारी वेशभूषा | Fashionable attire | फैशन वाला कपड़ा |
| प्रभूतः (पुं.प्र.ए.व.) | प्रचुरम् | पर्याप्त | Abundant | बहुत सारा |
| प्रधानमन्त्री-जनधन-योजना (स्त्री.प्र.ए.व.) | प्रधानमन्त्रि-जनधन-योजना | प्रधानमन्त्री जन धन योजना | Pradhan Mantri Jana Dhana Yojna | गरीबों की बैंक योजना |
| बाधितानि (नपुं.प्र.ब.व.) | अवरोधितानि | बाधित होते हैं | Interrupted | रुकावट |
| मा (अ) गृधः (पुं.प्र.ए.व.) | लोभं न कुरु | लालच न करो | Don’t covet | लालच मत करो |
| मूलभूतानाम् (नपुं.ष.ब.व.) | मूले भूतम्, तेषाम् | मौलिक | Basic | ज़रूरी चीजें |
| यथार्थतत्त्वम् (नपुं.प्र.ए.व.) | यथार्थं तत्त्वम् | वास्तविक तत्व | True essence | असली बात |
| राष्ट्रीय-पेंशन-योजना (स्त्री.प्र.ए.व.) | राष्ट्रीय-पेंशन-योजना | राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली | National Pension System (NPS) | पेंशन योजना |
| राष्ट्रीय-सञ्चय-प्रमाणपत्रम् (नपुं.प्र.ए.व.) | राष्ट्रीय-सञ्चय-प्रमाणपत्रम् | राष्ट्रीय बचत प्रमाणपत्र | National Savings Certificate (NSC) | बचत का कागज़ |
| वरिष्ठ-नागरिक-सञ्चय-योजना (स्त्री.प्र.ए.व.) | वरिष्ठ-नागरिक-सञ्चय-योजना | वरिष्ठ नागरिक बचत योजना | Senior Citizens’ Savings Scheme (SCSS) | बुज़ुर्गों की बचत योजना |
| विलासव्यसनाय (नपुं.नं.च.ए.व.) | विलासश्च व्यसनञ्च, तस्मै | सुख भोग के लिए | For luxury and enjoyment | ऐश‑मौज के लिए |
| विपन्ना (स्त्री.प्र.ए.व.) | सम्पन्नतारहिता | संकटग्रस्त | Destitute | मुसीबत में |
| शीतपेयम् (कर्मधारयः, नपुं.प्र.ए.व.) | शीतं पेयम् | मृदु पेय | Soft Drinks | ठंडा पेय |
| शुचिः (पुं.प्र.ए.व.) | पवित्रः | शुद्ध | Clean | साफ |
| सचेतनता (स्त्री.प्र.ए.व.) | विवेकः | जागरूकता | Consciousness | समझदारी |
| सञ्चयः (पुं.प्र.ए.व.) | सङ्ग्रहः | सञ्चय | Accumulation | बचत |
| सन्तुलनम् (नपुं.प्र.ए.व.) | समन्वयः | सन्तुलित करना | Balance | बराबरी |
| सुकन्या-समृद्धि-योजना (स्त्री.प्र.ए.व.) | सुकन्या-समृद्धि-योजना | सुकन्या समृद्धि योजना | Sukanya Samriddhi Yojna | बेटियों की बचत योजना |
| सूत्ररूपम् (नपुं.प्र.ए.व.) | संक्षेपरूपम् | संक्षिप्त रूप | Aphoristic form | छोटा रूप |
| स्वावलम्बी (पुं.प्र.ए.व.) | आत्मनिर्भरः | स्वावलम्बी | Self-reliant | अपने पैरों पर खड़ा |
अत्र इदम् अवधेयम्
चक्रवृद्ध्यंशम्
चक्रवृद्ध्यंशम् तादृशः वृद्ध्यंशः वर्तते यस्मिन् मूलधनेन सह वृद्ध्यंशस्य उपरि अपि वृद्ध्यंशः अर्ज्यते। येन कालान्तरेण धनस्य वृद्धिः अतिशीघ्रं भवति।
यथा — यदि भवान् 1000 निवेशं करोति, तत्र 10% वार्षिकं वृद्ध्यंशम् अर्जयति तर्हि प्रथमवर्षस्य अन्ते भवान् आहत्य 1100 धनं प्राप्स्यति। द्वितीयवर्षे 1000 इत्यस्य स्थाने 1100 राशेः उपरि वृद्ध्यंशं प्राप्स्यति। अनेन द्वितीयवर्षस्य अन्ते भवतः राशिः आहत्य `1210 यावत् वर्धते।
चक्रवृद्ध्यंशः कथं कार्यं करोति? इति अनया सारण्या स्पष्टं भविष्यति —
वर्ष आरम्भिकधनम्
| वर्षक्रमः | आरम्भिकधनम् | वार्षिकः वृद्ध्यंशः (10%) | चक्रवृद्ध्यंशः सहितं धनम् | साधारणवृद्ध्यंशेन सह धनम् |
|---|---|---|---|---|
| 1. | 1,000.00 | 100.00 | 1,100.00 | 1100 |
| 2. | 1,100.00 | 110.00 | 1,210.00 | 1200 |
| 3. | 1,210.00 | 121.00 | 1,331.00 | 1300 |
| 4. | 1,331.00 | 133.10 | 1,464.10 | 1400 |
| 5. | 1,464.10 | 146.41 | 1,610.51 | 1500 |
| 6. | 1,610.51 | 161.05 | 1,771.56 | 1600 |
| 7. | 1,771.56 | 177.16 | 1,948.72 | 1700 |
| 8. | 1,948.72 | 194.87 | 2,143.59 | 1800 |
| 9. | 2,143.59 | 214.36 | 2,357.95 | 1900 |
| 10. | 2,357.95 | 235.80 | 2,593.74 | 2000 |
सारः —
- निवेशितं मूलधनम् — 1,000
- वार्षिकः चक्रवृद्ध्यंशः — 10%
- दशवर्षानन्तरं धनस्य मूल्यम् — 2,593.74
निष्कर्षः — अनेन इदं सिद्धं यत् चक्रवृद्ध्या निवेशितं धनं शीघ्रं वर्धते यतोहि निवेशकर्ता न केवलं स्वस्य मूलधनस्य अपितु अर्जितवृद्ध्यंशस्य अपि उपरि वृद्ध्यंशम् अर्जयति। दीर्घकालीनसञ्चयस्य निवेशस्य च कृते एतत् किञ्चन सशक्तं साधनमस्ति।
गणनाकार्यम् (छात्राः कुर्वन्तु) — उपर्युक्तगणनायाः आधारेण `1000 निवेशितस्य मूलधनस्य पञ्चदशवर्षेषु विंशतिवर्षेषु वा चक्रवृद्ध्या सकलधनराशेः परिमाणं लिखत।
अभ्यासाद् जायते सिद्धिः
१. एकपदेन उत्तरं लिखत —
(क) वास्तविकसुखस्य आधारः कः? ……………………
उत्तरम्: धर्मः।
(ख) कस्य अभावात् सर्वकर्तव्यपालनं कठिनं भवति? ……………………
उत्तरम्: धनस्य।
(ग) अस्य आर्थिकव्यवहारः कतिविधः भवति? ……………………
उत्तरम्: त्रिविधः।
(घ) कीदृशः आर्थिकव्यवहारः कदापि न करणीयः? ……………………
उत्तरम्: अस्वस्थः
(ङ) स्वावलम्बनं कस्य मूलं वर्तते? ……………………
उत्तरम्: स्वाभिमानस्य।
(च) जलविन्दुनिपातेन क्रमशः किं पूर्यते? ……………………
उत्तरम्: घटः।
२. पूर्णवाक्येन उत्तरं लिखत —
(क) “सुखस्य मूलं धर्मः, धर्मस्य मूलम् अर्थः” इतीदं प्रसिद्धं वाक्यं कस्मिन् ग्रन्थे प्राप्यते?
उत्तरम्: इदं प्रसिद्धं वाक्यं कौटिल्यस्य अर्थशास्त्रे प्राप्यते।
(ख) सामान्यजीवने कासाम् आवश्यकतानां पूर्त्यर्थं धनम् आवश्यकम्?
उत्तरम्: सामान्यजीवने अन्नं, वस्त्रं, आवासः, शिक्षा, स्वास्थ्यसेवा इत्यादीनाम् आवश्यकतानां पूर्त्यर्थं धनम् आवश्यकम्।
(ग) ब्राह्मे मुहूर्ते कयोः चिन्तनम् आवश्यकम्?
उत्तरम्: ब्राह्मे मुहूर्ते धर्मस्य अर्थस्य च चिन्तनम् आवश्यकम्।
(घ) जनः केन स्वावलम्बी भवति?
उत्तरम्: जनः संचयस्य अभ्यासेन स्वावलम्बी भवति।
(ङ) लघुलघुसञ्चयः अपि कालान्तरे केन रूपेण वर्धते?
उत्तरम्: लघुलघुसञ्चयः अपि कालान्तरे चक्रवृद्ध्यंशेन महत्तररूपेण वर्धते।
३. वाक्येन सह ग्रन्थस्य सम्मिलनं कुरुत —
| (क) जलविन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्यते घटः। | १. गरुडपुराणम् |
| (ख) ब्राह्मे मुहूर्ते चोत्थाय धर्ममर्थं च चिन्तयेत्। | २. मनुस्मृतिः |
| (ग) सर्वेषामेव शौचानामर्थशौचं परं स्मृतम्। | ३. अर्थशास्त्रम् |
| (घ) सुखस्य मूलं धर्मः, धर्मस्य मूलम् अर्थः। | ४. चाणक्यनीतिः |
उत्तरम्:
| (क) जलविन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्यते घटः। | ४. चाणक्यनीतिः |
| (ख) ब्राह्मे मुहूर्ते चोत्थाय धर्ममर्थं च चिन्तयेत्। | १. गरुडपुराणम् |
| (ग) सर्वेषामेव शौचानामर्थशौचं परं स्मृतम्। | २. मनुस्मृतिः |
| (घ) सुखस्य मूलं धर्मः, धर्मस्य मूलम् अर्थः। | ३. अर्थशास्त्रम् |
४. रेखाङ्कितवाक्यमाधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत —
(क) सुखस्य मूलं धर्मः।
प्रश्नः — कस्य मूलं धर्मः अस्ति?
(ख) दिनस्य आरम्भे धर्मार्थयोः चिन्तनम् आवश्यकम्।
प्रश्नः — दिनस्य आरम्भे कयोः चिन्तनम् आवश्यकम्?
(ग) सन्मार्गेण एव धनार्जनं करणीयम्।
प्रश्नः — धनार्जनं केन करणीयम्?
(घ) अनैतिकः आर्थिकव्यवहारः कदापि न करणीयः।
प्रश्नः — कीदृशः आर्थिकव्यवहारः कदापि न करणीयः?
(ङ) सङ्कटकाले स्वाभिमानीजनः अन्यजनस्य आर्थिकसहायतां नापेक्षते।
प्रश्नः — सङ्कटकाले स्वाभिमानीजनः कस्य आर्थिकसहायतां नापेक्षते?
५. उचितपदैः रिक्तस्थानानि पूरयत। —
| धातुः | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| विद् | विधते | विधेते | विधन्ते |
| लभ् | …………………… | लभेते | लभन्ते |
| अपेक्ष् | अपेक्षते | …………………… | अपेक्षन्ते |
| वृध् | …………………… | वर्धेते | …………………… |
| सेव् | …………………… | …………………… | सेवन्ते |
| मुद् | मोदते | …………………… | …………………… |
उत्तरम्:
| धातुः | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| विद् | विधते | विधेते | विधन्ते |
| लभ् | लभते | लभेते | लभन्ते |
| अपेक्ष् | अपेक्षते | अपेक्षेते | अपेक्षन्ते |
| वृध् | वर्धते | वर्धेते | वर्धन्ते |
| सेव् | सेवते | सेवेते | सेवन्ते |
| मुद् | मोदते | मोदेते | मोदन्ते |
६. अधोलिखितानां प्रश्नानां शुद्धं विकल्पं चिनुत —
(क) “सुखस्य मूलं धर्मः, धर्मस्य मूलम् अर्थः” इत्यस्य मुख्य आशयः कः अस्ति?
(१) सुखस्य आधारः केवलम् अर्थः एव।
(२) धर्मस्य आधारः केवलं सुखम् एव।
(३) धर्मस्य आधारः अर्थः, सुखस्य आधारः धर्मः।
(४) सुखं, धर्मः, अर्थः – एतेषां मध्ये सम्बन्धः नास्ति।
उत्तरम्: (३) धर्मस्य आधारः अर्थः, सुखस्य आधारः धर्मः।
(ख) गरुडपुराणे किम् उपदिष्टम् अस्ति?
(१) रात्रौ धनस्य चिन्तनं करणीयम्।
(२) प्रभाते धर्मार्थयोः चिन्तनं करणीयम्।
(३) केवलं धर्मचिन्तनं करणीयम्।
(४) केवलम् अर्थचिन्तनं करणीयम्।
उत्तरम्: (२) प्रभाते धर्मार्थयोः चिन्तनं करणीयम्।
(ग) “सर्वेषामेव शौचानामर्थशौचं परं स्मृतम्” इत्यस्य तात्पर्यं किम्?
(१) जलशौचमेव श्रेष्ठम्।
(२) मृच्छौचमेव श्रेष्ठम्।
(३) अर्थशौचं सर्वोपरि, अन्यविधशौचेभ्यः श्रेष्ठः।
(४) शौचस्य आवश्यकता नास्ति।
उत्तरम्: (३) अर्थशौचं सर्वोपरि, अन्यविधशौचेभ्यः श्रेष्ठः।
(घ) छात्रैः क्रियमाणः अपव्ययः कः?
(१) स्वास्थ्यलाभाय व्ययः।
(२) विद्याजर्नाय व्ययः।
(३) आडम्बरयुक्तः प्रदर्शनात्मकः व्ययः।
(४) आत्मसुरक्षायै व्ययः।
उत्तरम्: (३) आडम्बरयुक्तः प्रदर्शनात्मकः व्ययः।
(ङ) “जलविन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्यते घटः” इति वाक्यं कः अवदत्?
(१) बृहस्पतिः
(२) चाणक्यः
(३) मनुः
(४) याज्ञवल्क्यः
उत्तरम्: (२) चाणक्यः।
सर्वाधिकार्याणाम् प्रश्नः
छात्राः अभिभावकैः सह समीपस्थं वित्तकोषम् अथवा पत्रालयं गत्वा प्रधानमन्त्रि-जनधनयोजना (PMJDY), सुकन्या-समृद्धि-योजना (SSY), सार्वजनिक-भविष्य-निधिः (PPF), वरिष्ठ-नागरिक-सञ्चय-योजना (SCSS), किसान-विकास-पत्रम् (KVP), राष्ट्रीय-सञ्चय-प्रमाणपत्रम् (NSC), राष्ट्रीय-पेंशन-योजना (NPS), नियतिनिक्षेपः (FD), आवृत्तिनिक्षेपः (RD) चेत्यादियोजनानां विषये ज्ञानं प्राप्नुयुः। एकस्याः योजनायाः विषये टिप्पणीं च लिखेयुः।
उत्तरम्:
संकेतः: छात्रः किसी एक योजना का नाम लिखकर उसके उद्देश्य और प्रमुख लाभों का संक्षेप में वर्णन कर सकता है।
| योजना | स्वरूपम् | लाभः | विशेषता |
|---|---|---|---|
| प्रधानमन्त्री-जनधन-योजना (PMJDY) | शून्य-बैलेंस-खातम् | बीमा, रुपे कार्ड, ओवरड्राफ्ट | गरीबजनानां वित्तीय-समावेशनाय |
| सुकन्या-समृद्धि-योजना (SSY) | कन्यायाः नाम्नि खातम् | उच्चं ब्याजं, कर-लाभः | कन्याशिक्षायाः विवाहाय च |
| सार्वजनिक-भविष्य-निधिः (PPF) | दीर्घकालीनं निवेशः | कर-लाभः, सुरक्षितं ब्याजम् | १५ वर्षपर्यन्तं |
| वरिष्ठ-नागरिक-सञ्चय-योजना (SCSS) | वृद्धजनानां निवेशः | उच्चं ब्याजं, सुरक्षितम् | ५ वर्षपर्यन्तं |
| किसान-विकास-पत्रम् (KVP) | निश्चितकालिकं पत्रम् | धनं दोगुणं भवति | कृषकानां हिताय |
| राष्ट्रीय-सञ्चय-प्रमाणपत्रम् (NSC) | बचत-पत्रम् | निश्चितं ब्याजम् | कर-लाभः |
| राष्ट्रीय-पेंशन-योजना (NPS) | पेंशन-निवेशः | निवृत्त्युपरान्तं मासिकं आयः | दीर्घकालीनं सुरक्षा |
| नियतिनिक्षेपः (FD) | निश्चितकालिकं निक्षेपः | निश्चितं ब्याजम् | सुरक्षितं निवेशः |
| आवृत्तिनिक्षेपः (RD) | मासिकं निक्षेपः | ब्याजेन सह संचयः | लघु-लघु-राशिभिः महत्सञ्चयः |
यस्तु क्रियावान् मनुजः स विद्वान्।
१. अस्मिन् पाठे पठितानां सूक्तीनां श्लोकानां च आशयं स्वभाषया विलिख्य शिक्षकाय दर्शयत।
उत्तरम्: अर्थः, धर्मः, सुखम् – एतेषां परस्परसम्बन्धः स्पष्टः। धर्मस्य आधारः अर्थः, सुखस्य आधारः धर्मः इति। न्यायपूर्वकं धनार्जनं, उचितव्ययः, संचयः च जीवनस्य संतुलनं स्थापयन्ति।
२. भवन्तः स्वजीवने अपव्ययात् कथं दूरे स्थातुं शक्नुवन्ति? अस्मिन् विषये उपायान् लिखत।
उत्तरम्: अपव्ययात् दूरं स्थातुं छात्राः आवश्यकतानुसारं व्ययम् एव करोतु। आडम्बरयुक्तं खर्चं, विलासव्यसनाय व्ययम्, शीघ्राहारः, शीतपेयम् इत्यादीनां त्यागः करणीयः। संचयस्य अभ्यासः अपव्ययात् रक्षणं करोति।
३. स्वस्य एकस्य मासस्य आय-व्ययविवरणं विलिख्य शिक्षकाय दर्शयत।
उत्तरम्:
- यथा — आयः = १०,००० रूप्यकाः।
- व्ययः = अन्नं ३,०००, वस्त्रं १,५००, शिक्षा २,०००, स्वास्थ्य १,५००, संचयः २,०००।
४. जलस्य संरक्षणं कैः उपायैः करणीयमिति कक्षायां चर्चयत सचित्रं प्रदर्शयत च।
उत्तरम्: जलसंरक्षणं वर्षाजलसञ्चयेन, नलिकायाः समये बन्दनेन, अपव्ययस्य निरोधेन, पुनःप्रयोगेन च करणीयम्। कक्षायां चित्रैः सह चर्चयेत।
५. विद्युतः संरक्षणं कथं कर्तुं शक्यते तस्य चित्रं निर्माय शिक्षकाय दर्शयत।
उत्तरम्: विद्युत्संरक्षणं दीपकस्य समये बन्दनेन, LED बल्बप्रयोगेन, सौरऊर्जायाः उपयोगेन, उपकरणानां अनावश्यकप्रयोगस्य त्यागेन च शक्यते। छात्राः चित्रं निर्माय शिक्षकाय दर्शयेत।
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